ज़हर पीकर जीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले आँसू सूखे हुए थे पलकों से बरसते हैं सितारे सारी रात चाँद को तरसते हैं एक पूरा दिन पीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले महके-महके लगते हैं गीले पलाश के पल उड… more →
तख़लीक़-ए-नज़रKrishna Kumar Mishra wrote 3 weeks ago: पलाश का पुष्प भारत वर्ष का एक गांव जो इतिहास में कोसल राज्य के अंतर्गत था बाद में अवध के नबा … more →
विनय wrote 1 year ago: ज़हर पीकर जीने चले कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले आँसू सूखे हुए थे पलकों से बरसते हैं सितारे सारी रात चाँ … more →
विनय wrote 1 year ago: जानते हैं दर्द बुझते हुए चाँद का जब बढ़ते आते हैं सुबह के क़दम जुस्त-जू की छाया खो जाती है कहीं चाँद … more →
विनय wrote 1 year ago: पलाश का फूल हूँ ज़िन्दगी है ख़ुशबू से जुदा कभी मैं जुदा कभी तुम जुदा और ज़िन्दगी क्या? शायिर: विनय प्र … more →