घर के सामने पसरी तरई भर धूप निहाल रहती है - बैठते हैं एक वृद्ध उसकी छाँव में आज कल।मैं सोचता हूँ – कितनी उदास रही होगी अकेली उपेक्षित धूप अब के पहले तक ! कल मैंने सुना घर को… more →
वर्ड प्रेस पर आलसीगिरिजेश राव wrote 2 months ago: . . . अम्माँ, आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ … more →