माना ये जग है सफर चार दिन का हम हैं मुसाफिर ये मेला छूटेगा जब होगा धमाका मौत छीन लेगी खाली हाथ जाते दिल भी टूटेगा पंडित बताते मत करो हाय तौबा धरो हाथ पर हाथ, सब कुछ वो देगा दे डालो सब कुछ, शिकायत करो … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: माना ये जग है सफर चार दिन का हम हैं मुसाफिर ये मेला छूटेगा जब होगा धमाका मौत छीन लेगी खाली हाथ जाते … more →
Tags: तुकान्त, हिन्द-युग्म, इन्सान, मुसाफ़िर, मेला, सफर
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