जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे जिससे मिलते हैं वह पुल टूट गया बारिश बाढ़ बनी कि फिर हाथों से हाथ छूट गया उम्मीदें क्यों रखते हैं ज… more →
तख़लीक़-ए-नज़रदीपक भारतदीप wrote 7 months ago: अपने देश के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग है जो हमेशा हर दुर्घटना के प्रति समाज की संवेदनहीनता को उबार क … more →
विनय wrote 1 year ago: जैसे-तैसे निभाते हैं प्यार करके पछताते हैं सच्चे-झूठे सपने तेरे रातों की नींदें उड़ाते हैं दो किनारे … more →