हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके हमने हसरते-रफ़ू छोड़ दी बुलाता रहा माज़ी पलट-पलट के मगर अब इश्क़ की खू़ छोड़ दी मैं हूँ अधूरी खा़हिशों का मुब्तिला ग़ाल… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: हमने अबस की आरज़ू छोड़ दी तुमको पाने की जुस्तजू छोड़ दी चाक़ जिगर को गरेबाँ में छिपाके हमने हसरते-रफ़ू … more →