कोई हमारे दर्द को आकर सहलाये इस चाह में इन्तजार करने का ज़माना अब नहीं रहा किसी के दर्द को सहलाकर हम अपने दिल को तसल्ली कर लें पर किसी के दिल का हिस्सा बन जाएं ऐसा नाम कमाना नहीं रहा जिन्दगी के इस सफर … more →
दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 9 months ago: जिस तरह बुद्धिमान लोग करे रहे हैं अगडम-बगडम बातें उससे तो लगता है कि बंधुआ मजदूरों का युग गया तो बंध … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: कोई हमारे दर्द को आकर सहलाये इस चाह में इन्तजार करने का ज़माना अब नहीं रहा किसी के दर्द को सहलाकर हम … more →