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Blogs about: भारतindia

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गाँव के आवारा कुत्ते भी ठण्ड से बचने के लिए कही जा छुपे थे |

विजय-राज चौहान wrote 9 months ago: *************** पूस महीने की कड़के की ठण्ड पड़ रही थी | गेहूँ जमकर काफी बड़े हो गए थे, उनमें अब कोर ल … more →

Tags: उपन्यास

नन्हा बालक माँ -बाप की वास्तविक ममता से वंचित था |

विजय-राज चौहान wrote 10 months ago: ************* अलार्म घड़ी की आवाज आई तो रूबिया ने अल साई आँखों से उसका स्विच ऑफ कर दिया | उसने देखा … more →

Tags: उपन्यास

तुम कुत्ते के मुँह की इस हड्डी को इसके मुँह में भी देना चाहते हो |

विजय-राज चौहान wrote 11 months ago: लगभग पाँच साल बीत जाते है | समय की मरहम और पारो,हरिया के प्यार ने दीनू के जख्मो को भर दिया था | बालक … more →

Tags: उपन्यास

दीनू ने अन्न का एक भी दाना मुँह में नही डाला था |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दो दिन हो गए थे लेकिन दीनू ने अन्न का एक भी दाना मुँह में नही डाला था, वह अन्दर कोठे में पड़ा फुलवा क … more →

Tags: उपन्यास

दीनू कापते हाथों से चिता में अग्नि प्रवाहित करता है |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: रात के लगभग बारह बज चुके थे | बैलगाड़ी गाँव की तरफ चल रही थी ,हरिया , दीनू ओर पारो चुपचाप बैठे थे । … more →

Tags: उपन्यास

उसने अपनी आँखों के सामने दो खून होते हुए देखे थे |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दीनू का घुटना दीवार से टकरा जाता है और उससे खून बहने लगता है | दीनू जमीन पर हाथ रखकर खड़ा होता है | … more →

Tags: उपन्यास

भगवान के लिए मेरी पत्नी को बचा लीजिये डॉक्टर.......|

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: अन्दर हाल की चकाचौंध और जलते-बुझते बल्बों को देखकर दीनू की आँखें चुंधिया जाती है | वह वाही खड़ा हो ज … more →

Tags: उपन्यास

दीनू गार्ड के पाँव पकड़ लेता है, उसकी आंखें भर आई थी |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दीनू बैलगाड़ी को खड़ी करके डॉक्टर साहब के मकान की तरफ़ दौड़ता है | वह दरवाजे को जोर-जोर से खटखटाता है … more →

Tags: उपन्यास

फुलवा दर्द के मारे जोर-जोर से चिल्ला रही थी,उसकी चीखे आसमान छू रही थी | 1 comment

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दीनू के आते ही हरिया ने पूछा -”क्यों दीनू क्या हुआ, डॉक्टर साहब मिले नहीं क्या ?”        … more →

Tags: उपन्यास

फ़ुलवा चारपाई पर पडी प्रसव पीडा से कराह रही थी |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago:   ******* सावन का महीना था और बारिश का मौसम चल रह था ।फ़ुलवा चारपाई पर पडी प्रसव पीडा से कराह रही थी … more →

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मोहिनी के पैर नशे में लड़खड़ा रहे थे |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago:   ******* रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजने को जा रहे थे , मिस्टर चढ्ढा और रूबिया दोनों घर आ चुके थे और … more →

Tags: उपन्यास

दीनू खाना खा कर जाकर चारपाई पर लेट जाता है कुछ देर बाद फुलवा भी चली आती है |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दीनू चिलम लेकर आ जाता है | वह उसे हुक़्क़े पर रख देता है तो दोनों हुक्का गुडगुडाने लगते है | दीनू कु … more →

Tags: उपन्यास

दीनू हुक़्क़े से चिलम उठा कर चिलम भरने चला जाता है |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: पारो छप्पर में बैठी चूल्हे पर खाना बना रही थी |छोटा बालक भारत बहार नीम के पेड़ पर पड़े झूले में सो रह … more →

Tags: उपन्यास

१५ अगस्त पर विशेषः(हिन्दी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र कि प्रगति में बाधक है |)

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: मित्रों आपके सामने अपने प्रकाशित उपन्यास “भारत/INDIA” से पेज १५६-१५८ तक के कुछ अंश जो मु … more →

Tags: उपन्यास

सुखिया किचन के बहार जमीन पर बैठकर खाना खा रही थी

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: रूबिया-”क्योंजी कोई अच्छा सा नाम बताओ ना , जो हम अपने राजा बेटे का रख सके “| चढ्ढा साहब … more →

Tags: उपन्यास

चढ्ढा साहब सिगरेट सुलगाये पलंग पर तकिया के सहारे लेटे दम लगा रहे थे |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: दीनू आँगन में चारपाई पर बैठा हुक्का गुडगुडा रहा था, हरिया को देखते ही -”आओ हरिया आओ ,क्या हाल … more →

Tags: उपन्यास

"हमारा बच्चा "-रोती हुई रूबिया ने पालने की तरफ़ हाथ करते हुए कहा

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: अचानक ही पारो हरिया के कंधे को हिलती है, “किस सोच में डूब गए हो , गाँव का स्टेशन आने वाला है … more →

Tags: उपन्यास

तुझे तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी.......

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: ………पारो की आँखों में आंसू थे,वह कुछ नहीं बोलती और हरिया की चारपाई से उठ कर अपनी चा … more →

Tags: उपन्यास

"भगवान के घर देर है अंधेर नहीं " |

विजय-राज चौहान wrote 1 year ago: null …….थोडी देर के बाद श्रीमती टंडन रूबिया के कमरे में प्रवेश करती है |उनके साथ उनकी ती … more →

Tags: उपन्यास


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