गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता गया अब बावला रे ! तु चैन से सोना चाहता है कैद हैं सब टेन्शन टकराते मेरे भीतर तेज जलता चिराग अब बुझना… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 3 weeks ago: गम भुलाकर दिमाग खुश होना चाहता है ये दुखी दिल जी भर के अब रोना चाहता है ढो लिये चाँद-तारे आकाश उकता … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 months ago: लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा क्रेन पर ऊँचा चढ़ा कर, चैन उसकी तोड़ दी लोभ का दर्शन बना … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: घुटन है दिल में बहुत, नाराज दोनो रब जहाँ प्रश्न तो सुलझा नहीं, तू कौन है और है कहां ? पी गया आंसू, ज … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: मन्त्रीजी स्वर्ग सिधारे ( नरक के बदले ) शायद चित्रगुप्त की भूल या खिलाया कम्प्यूटर ने गुल नकली दया द … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: ( पिछ्ली कविता का शेष ) चित्रगुप्त ने जवाब दिया हँसते हुये - “कैसा स्वर्ग मत्रींजी ! याद कीजिये आपने … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: ( अति मह्त्वाकांक्षी लोग… क्या क्या गुल खिलाती हैं उनकी हीन ग्रन्थियां…) पिकनिक पॉइन्ट पर खड़ा मैं … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: हम कवि हैं या मसखरे सब को हँसाते जनता का दिल लुभाते कविता याने कि कैसी हो बहती नदी जैसी हो पहले कवित … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: विषम स्थिति हो लोग पराये फिर भी सब मे ईश्वर जानो भांति भांति के फूल जगत मे खिलने दो खुशबू पहचानो अ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: मौत से आंखमिचोली कारगील हो या गेलीपोली जंग की शतरंज का वादा कोई वजीर ना प्यादा सीने मे लगती जब गो … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: बचपन की सहपाठिन मिल गई शुरू हुये ईमेल बीवी ने जब बांच लिये तो खतम हो गया खेल पूछपरछ मे धमधम गीरते बर … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: कंगला डूबा चिन्ता मे तू मुझे लूट कर क्यों ले जाय नंगा बोल पड़ा हाय! तू मेरे क … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: राजनीति के दावपेंच मे चला अगर ना सिक्का जाली लोग हमीं को देंगे गाली भरम भारी पिटारा खाली जम कर जेब … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पिचकारी खेले ससुरी ऐसे रंग फेंक कर के मचलती कैसे बौछार तीर की निकलती ज्वाला चमकार बिजली की झूमती बाल … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: -हरिहर झा आंसू मे डूबी वीणा ले मधुर गीत मै कैसे गाता बचपन मेरा सूखा पतझड़ हरियाली मै कैसे लाता खेलकू … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई बैरा निगोड़ा पूछ जाता … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: खुल कर रोया था जनमने के बाद हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं। अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: कोयलिया प्रीत के गीत गाने लगी दिल धड़कता रहा मन मचलने लगा चांदनी श्वेत परिधान से सज गई खिलखिलाता पवन … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: रंग फेका लाल गुलाबी वो वेवलेन्थ की बात करने लगा बुद्धु नादान सैयां आइन्स्टीन को मात करने लगा मैंने छ … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: नजरों से गश आया साकी मदिरा ढलने पर क्या होगा। प्यास बुझाने पानी मांगा अमृत की अब चाह नहीं नन्हा दीपक … more →