. . . अम्माँ, आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ और पोते लेकिन बरम बाबा के बगल का गँवारू मकान सूना रहेगा। अकेले पिताजी से इधर उधर की बातें कर अपना औ… more →
वर्ड प्रेस पर आलसीगिरिजेश राव wrote 2 months ago: . . . अम्माँ, आज जब तुम दिया जलाओगी तो मुझे पता है कि आंसुओं को रोके रखोगी। दो बेटे, बहुएँ, नतिनियाँ … more →
Praful wrote 10 months ago: अजय शर्मासॉफ़्टवेयर इंजीनियर भारत में अक्तूबर-दिसंबर के बीच पाँच लाख नौकरियाँ गईं मैंन … more →
विनय wrote 2 years ago: शाम गहरी हो रही थी सुनहरा चाँद बादलों से झाँक रहा था छत पे था मैं और पुरवाई बह रही थी तेरा ख़्याल और … more →
विनय wrote 2 years ago: यादों का सागर गहरा है उसमें डूब जाऊँ तो वक़्त का हर लम्हा ठहरा है कोई काँटा-सा है जो लग गया है इक फाँ … more →