विनय wrote 1 year ago: ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ी … more →
विनय wrote 1 year ago: एक ही रास्ता जब है दोनों का फिर क्यों दोनों तन्हा फिर क्यों दोनों तन्हा मेरा मरहम है तू मेरा मज़हब है … more →