दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँद नहीं आता मरासिम हम से यूँ निभाये नहीं निभते ख़ुदा के आस्ताँ पे आज भी सर झुकाये हूँ मगर दाग़े-दिल उ… more →
तख़लीक़-ए-नज़रत्रिपुरारि कुमार शर्मा wrote 4 months ago: झुलस रहा है मेरे जिस्म का कोना-कोना रूह को आग लग गई जैसे कुछ दिनों से दिन-रात मेरी आंखों में कोई तकल … more →
विनय wrote 9 months ago: दाग़े-शबे-हिज्राँ बुझाये नहीं बुझते आँसू बहते हैं इतना छुपाये नहीं छिपते होता है कभी, शाम आती है चाँ … more →
विनय wrote 1 year ago: निख्खा शक्कर है उससे मरासिम में ज़्यादा को इक रोज़ ज़हर होना था अब तू ही बता, मैं तुझसे जुदा किधर जाऊँ … more →
Amarjeet Singh wrote 2 years ago: … more →
विनय wrote 2 years ago: बारिश, बूँदें, पत्ते, मिट्टी -सौंधी रात, चाँद, तारे, निगाह -मेरी मरासिम लफ़्ज़ों से नहीं होते एहसास से … more →
विनय wrote 2 years ago: लहर इक ‘विनय’ टकराया जो पत्थर से टूट गया जब भी निकला आगे उसके हाथों से एक हाथ छूट गया जब भी बैठता है … more →
विनय wrote 2 years ago: नामालूम वह दिन मैंने जन्नत में गुज़ारे या जहन्नुम में मगर बीते हुए दिन मुझे आज भी ढ़ूँढते हैं वह ताने … more →