ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा जब उस ख़ुदा ने अर्श को और फ़र्श को बांटा नहीं फिर चैन कैसे आदमी इन सरहदों में पायेगा घर में जाके देख तो बच्चे हैं कुछ … more →
इक शायर अंजाना सा...pryas wrote 10 months ago: कुछ क्षणिकाँएं लिखने की कोशिश की है. कृपया गलतीयाँ निकालें. स्कुल जाते बच्चे, घर बिठायी जाती बच्चिया … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: ना मंदिरों में पायेगा ना मस्जिदों में पायेगा ढ़ूंढ़ना है जो ख़ुदा तो ग़मज़दों में पायेगा जब उस ख़ुदा ने अर … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: मस्जिदों में भी साक़ी का नाम लेता हूँ वूज़ू के वास्ते हाथों में जाम लेता हूँ नशा कराके तो सब ही गिराया … more →