आ री सखी चलें फिर वहीं जहाँ पहली बार मिले थे जहाँ सपनों की गलियाँ छूटी थीं हक़ीक़त के दरवाज़े खुले थे चाँद-तारों की बारात आयी है हमारे इश्क़ पर सजदे करने हल्के-फुल्के नये ख़ाब बुनने हाथों में हाथ लेकर चले… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: आ री सखी चलें फिर वहीं जहाँ पहली बार मिले थे जहाँ सपनों की गलियाँ छूटी थीं हक़ीक़त के दरवाज़े खुले थे च … more →