इस एक बूँद आँसू में चाहे साम्राज्य बहा दो वरदानों की वर्षा से यह सूनापन बिखरा दो इच्छाओं की कम्पन से सोता एकान्त जगा दो, आशा की मुस्कराहट पर मेरा नैराश्य लुटा दो । चाहे जर्जर तारों में अपना मानस उलझा… more →
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!Shivam Misra wrote 2 months ago: छायावाद की प्रमुख स्तंभ महादेवी वर्मा को हिंदी साहित्य में दुख और पीड़ा को बखूबी बयां करने के लिए … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: काव्य संग्रह दीपशिखा से तरल मोती से नयन भरे! मानस से ले, उटे स्नेह-घन, कसक-विद्यु पुलकों के हिमकण, स … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: काव्य संग्रह दीपशिखा से पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! और होंगे चरण हारे, अन्य हैं जो लौटत … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: रंगों के बादल निरतरंग, रूपों के शत-शत वीचि-भंग, किरणों की रेखाओं में भर, अपने अनन्त मानस पट पर, तुम … more →
Rewa Smriti wrote 11 months ago: इस एक बूँद आँसू में चाहे साम्राज्य बहा दो वरदानों की वर्षा से यह सूनापन बिखरा दो इच्छाओं की कम्पन स … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: कहां रहेगी चिड़िया ? आंधी आई जोर शोर से डाली टूटी है झकोर से उड़ा घोंसला बेचारी का किससे अपनी बात कह … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या! तारक में छवि प्राणों में स्मृति पलकों मे नीरव पद की गति लघु उर पुल … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: पूछता क्यों शेष कितनी रात? छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्ज … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: मधुरिम के मधु के अवतार सुधा से सुषमा से छविमान आंसुओं में सहमे अभिराम तारकों से हे मूक अजान! सीख कर … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्य पला! जिसने उसको ज्वाला सौंपी उसने इसमें मकरंद भरा, आलोक … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: बताता जा रे अभिमानी! कण-कण उर्वर करते लोचन स्पन्दन भर देता सूनापन जग का धन मेरा दुख निर्धन तेरे वैभव … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: हम कवि हैं या मसखरे सब को हँसाते जनता का दिल लुभाते कविता याने कि कैसी हो बहती नदी जैसी हो पहले कवित … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: फिर तुमने क्यों शूल बिछाए? इन तलवों में गति-परमिल है, झलकों में जीवन का जल है, इनसे मिल काँटे उड़ने … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! और होंगे चरण हारे, अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे; … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: वे मुस्काते फूल नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप नहीं जिनको भाता है बुझ जाना वे सूने से न … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: मैं नीर भरी दु:ख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हंसा, नयनों में दीपक से … more →