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Blogs about: महादेवी वर्मा

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महादेवी ने साहित्य में पुरुषों का वर्चस्व तोड़ा था

Shivam Misra wrote 2 months ago: छायावाद की प्रमुख स्तंभ महादेवी वर्मा को हिंदी साहित्य में दुख और पीड़ा को बखूबी बयां करने के लिए … more →

तरल मोती से नयन भरे / महादेवी वर्मा1 comment

Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: काव्य संग्रह दीपशिखा से तरल मोती से नयन भरे! मानस से ले, उटे स्नेह-घन, कसक-विद्यु पुलकों के हिमकण, स … more →

पंथ होने दो अपरिचित - महादेवी वर्मा

Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: काव्य संग्रह दीपशिखा से पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! और होंगे चरण हारे, अन्य हैं जो लौटत … more →

क्यों अश्रु न हों श्रृंगार मुझे! - महादेवी वर्मा

Satish Chandra satyarthi wrote 10 months ago: रंगों के बादल निरतरंग, रूपों के शत-शत वीचि-भंग, किरणों की रेखाओं में भर, अपने अनन्त मानस पट पर, तुम … more →

उत्तर4 comments

Rewa Smriti wrote 11 months ago: इस एक बूँद आँसू में चाहे साम्राज्य बहा दो वरदानों की वर्षा से यह सूनापन बिखरा दो इच्छा‌ओं की कम्पन स … more →

कहां रहेगी चिड़िया?1 comment

Rewa Smriti wrote 1 year ago: कहां रहेगी चिड़िया ? आंधी आई जोर शोर से डाली टूटी है झकोर से उड़ा घोंसला बेचारी का किससे अपनी बात कह … more →

Tags: कलम आज उनकी जय बोल

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!10 comments

Rewa Smriti wrote 1 year ago: तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या! तारक में छवि प्राणों में स्मृति पलकों मे नीरव पद की गति लघु उर पुल … more →

Tags: कलम आज उनकी जय बोल

जाग तुझको दूर जाना!

Rewa Smriti wrote 1 year ago: चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना! जाग तुझको दूर जाना! अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप … more →

Tags: कलम आज उनकी जय बोल

जब यह दीप थके

Rewa Smriti wrote 1 year ago: जब यह दीप थके तब आना। यह चंचल सपने भोले है, दृग-जल पर पाले मैने, मृदु पलकों पर तोले हैं; दे सौरभ के … more →

Tags: कलम आज उनकी जय बोल

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ3 comments

Rewa Smriti wrote 1 year ago: बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ! नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में, प्रथम जागृति थी जगत के प … more →

पूछता क्यों शेष कितनी रात?

Rewa Smriti wrote 1 year ago: पूछता क्यों शेष कितनी रात? छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्ज … more →

फूल

Rewa Smriti wrote 1 year ago: मधुरिम के मधु के अवतार सुधा से सुषमा से छविमान आंसुओं में सहमे अभिराम तारकों से हे मूक अजान! सीख कर … more →

सब आँखों के आँसू उजले

Rewa Smriti wrote 1 year ago: सब आँखों के आँसू उजले सबके सपनों में सत्‍य पला! जिसने उसको ज्‍वाला सौंपी उसने इसमें मकरंद भरा, आलोक … more →

बताता जा रे अभिमानी!

Rewa Smriti wrote 1 year ago: बताता जा रे अभिमानी! कण-कण उर्वर करते लोचन स्पन्दन भर देता सूनापन जग का धन मेरा दुख निर्धन तेरे वैभव … more →

हम कवि हैं या मसखरे4 comments

Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: हम कवि हैं या मसखरे सब को हँसाते जनता का दिल लुभाते कविता याने कि कैसी हो बहती नदी जैसी हो पहले कवित … more →

Tags: अतुकांत, व्यंग्य, मंच, हिन्द-युग्म, कवि, मंचीय कविता

फिर तुमने क्यों शूल बिछाए?

Rewa Smriti wrote 2 years ago: फिर तुमने क्यों शूल बिछाए? इन तलवों में गति-परमिल है, झलकों में जीवन का जल है, इनसे मिल काँटे उड़ने … more →

पंथ होने दो अपरिचित

Rewa Smriti wrote 2 years ago: पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला! और होंगे चरण हारे, अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे; … more →

मिटने का अधिकार

Rewa Smriti wrote 2 years ago: वे मुस्काते फूल नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप नहीं जिनको भाता है बुझ जाना वे सूने से न … more →

मैं नीर भरी दुख की बदली

Rewa Smriti wrote 2 years ago: मैं नीर भरी दु:ख की बदली! स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रन्दन में आहत विश्व हंसा, नयनों में दीपक से … more →


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