ले लो दो आने के चार लड्डू राज गिरे के यार यह हैं धरती जैसे गोल ढुलक पड़ेंगे गोल मटोल इनके मीठे स्वादों में ही बन आता है इनका मोल दामों का मत करो विचार ले लो दो आने के चार। लोगे खूब मज़ा लायेंगे ना लोग… more →
कारवाँSatish Chandra satyarthi wrote 8 months ago: हम कहते हैं बुरा न मानो, यौवन मधुर सुनहली छाया। सपना है, जादू है, छल है ऐसा पानी पर बनती-मिटती रेखा- … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 8 months ago: यह अमर निशानी किसकी है? बाहर से जी, जी से बाहर- तक, आनी-जानी किसकी है? दिल से, आँखों से गालों तक- यह … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 8 months ago: चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, चाह नह … more →
संपादक- मिथिलेश वामनकर wrote 11 months ago: माखनलाल चतुर्वेदी ‘सुजन, ये कौन खड़े है ?’ बन्धु ! नाम ही है इनका बेनाम । … more →
संपादक- मिथिलेश वामनकर wrote 11 months ago: कवि: माखनलाल चतुर्वेदी —————- क्या गाती हो? क्यों रह-रह जाती हो? कोक … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: ले लो दो आने के चार लड्डू राज गिरे के यार यह हैं धरती जैसे गोल ढुलक पड़ेंगे गोल मटोल इनके मीठे स्वाद … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: कौन पथ भूले, कि आये ! स्नेह मुझसे दूर रहकर कौनसे वरदान पाये? यह किरन-वेला मिलन-वेला बनी अभिशाप होकर, … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ, चाह न … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: क्या कहा कि यह घर मेरा है? जिसके रवि उगें जेलों में, संध्या होवे वीरानों मे, उसके कानों में क्यों कह … more →
kuldeepsingh wrote 1 year ago: चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ, चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ल … more →