क्यों पोत रही तुम मेरी सूखी हड्डियों पर इन्द्रधनुषी रंग उतर कर मेरे आंगन में ! क्यों जम्हाई लेने के बदले ले रही मनमोहक अंगड़ाई; चीखो और चिल्लाओ ! रोको मत बहने दो दुख भरे आँसूओं को क्यों कि मैं तो विमूढ़… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 4 months ago: क्यों पोत रही तुम मेरी सूखी हड्डियों पर इन्द्रधनुषी रंग उतर कर मेरे आंगन में ! क्यों जम्हाई लेने के … more →