( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से ) छुटा देश तो जीना दूभर दुखड़ा किससे कहना माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना समझे दर्द न दिल का कोई घूटी रही अभिलाषा मातृस्नेह क… more →
हरिहर झाडा. अमर कुमार wrote 7 months ago: नमस्कार ! एक अँतराल के पश्चात यह कड़ियाँ प्रारँभ करने का मन बनाया है । किसी हुतात्मा की अवमा … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: ( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से ) छुटा देश तो जीना दूभर दुखड़ा किससे कहना … more →