गिर जायेगा इस बरसात में घर तुम हो उधर हम हैं इधर जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा जिस सिम्त दौड़ती है नज़र न तुम हो मेहरबाँ न हक़ ही है होता नहीं किसी पे दुआ का असर ख़ाली दिल में साँसें बोझ लगती हैं और मुसक… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: गिर जायेगा इस बरसात में घर तुम हो उधर हम हैं इधर जंगल ही जंगल है सब वीराना-सा जिस सिम्त दौड़ती है नज़ … more →