यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेरे इस जिस्म की गीली मिट्टी से किसी ने कभी न छुआ ऐसे मुझे जिस तरह से छुआ है तूने मुझको मैं बहुत भटका ह… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 10 months ago: यह मुनासिब नहीं मैं भुला दूँ तुझको तेरे सिवा कुछ होश नहीं है मुझको ना जाने कितने अजनबी गुज़रे हैं मेर … more →
विनय wrote 1 year ago: हज़ारों की भीड़ में हम अकेले रह गये जिसके साथ की तमन्ना थी मेरे दिल को वह तो केवल अब मेरे ख़ाबों में … more →
विनय wrote 1 year ago: बारिश, बूँदें, पत्ते, मिट्टी -सौंधी रात, चाँद, तारे, निगाह -मेरी मरासिम लफ़्ज़ों से नहीं होते एहसास से … more →
विनय wrote 1 year ago: रोज़, यह बुझता नहीं शब, यह गलती नहीं बिन तेरे सब कुछ थम के रह गया है *दिन में रोशनी होती है, इसलिए … more →
विनय wrote 1 year ago: आज महसूस किया मैंने गर तुम्हें किसी और के साथ देखूँ तो मेरे दिल पे क्या गुज़रेगी कैसा महसूस करूँगा बा … more →