यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे काँधे पे अपने रख़ के अपना मजा़र गुज़रे बैठे रहे हैं रास्ता में दिल का खानदार सजा़ कर शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे कोई तो प… more →
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!Rewa Smriti wrote 1 year ago: यूँ तेरी रहगुज़र से दिवानावर गुज़रे काँधे पे अपने रख़ के अपना मजा़र गुज़रे बैठे रहे हैं रास्ता में द … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: यह न सोचो कल क्या हो कौन कहे इस पल क्या हो रोओ मत, न रोने दो ऐसी भी जल-थल क्या हो बहती नदी की बांधे … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता जब मेरी कहानी में वॊ नाम नहीं होता जब जुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए … more →