यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई थी दर्द मेरे दिल में बढ़ते रहे इफ़रात… इन अफ़सानों में अपना एक किरदार है ज़ुबाँ से निकला हर लफ़्ज़ किरा… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई थी द … more →