परछाईयों के इस शहर में ढूँढता हूँ अपनी परछाई न कोई दीप प्रज्जवलित मेरे आगे, मेरे पीछे मेरे दांये या कि बायें खेल जगत का,संगीत सत्य का नाट्य-नृत्य का,साहित्य शब्द का. परछाईयों के इस नगर में खोजता मैं ख… more →
वाणीvikash wrote 2 years ago: परछाईयों के इस शहर में ढूँढता हूँ अपनी परछाई न कोई दीप प्रज्जवलित मेरे आगे, मेरे पीछे मेरे दांये या … more →