तुम जिस तरह से देखती हो मुस्कुराकर मुझे मेरी रूह भी पाकीज़गी का एहसास करती है, चलो यह बदशक़्ल आख़िरश पाकीज़ा तो हुआ! शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००३ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 11 months ago: तुम जिस तरह से देखती हो मुस्कुराकर मुझे मेरी रूह भी पाकीज़गी का एहसास करती है, चलो यह बदशक़्ल आख़िरश प … more →
विनय wrote 1 year ago: तुमने हमसे हमको चुराया दिल में अपने हमको बसाया हम कुछ दीवाने हो गये हैं हाँ, दूर ख़ुद से हो गये हैं … more →
विनय wrote 1 year ago: एक दोस्त मेरा भी हो एक यार मेरा भी हो जिसकी बाँहों में मुझे मिल जाये ज़िन्दगी जो झूठ-मूठ रूठ के सताये … more →