मुस्कुराने पर भी कर्ज़ है दिल को ये कैसा मर्ज़ है अश्क़ों से कहो मुँह ना फेरें इनका भी कुछ फ़र्ज़ है ये जहां दूर यूँ बैठा है कि सबपर हमारा कर्ज़ है मुन्तज़िर आहें यहाँ बैठी हैं खुशियों को आने में लर्ज़ है अब … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: मुस्कुराने पर भी कर्ज़ है दिल को ये कैसा मर्ज़ है अश्क़ों से कहो मुँह ना फेरें इनका भी कुछ फ़र्ज़ है ये ज … more →