एक चिंगारी जल रही है भीतर उसकी लौ कभी तेज होती है कभी सोच-विचार के फेर में पड़कर धीमी पड़ जाती है लेकिन जब हवाओं का रुख बदलता है मौसम अंगड़ाई लेती है बादल मचल उठता है बारिश डूबो देती है तन-मन को शांति… more →
इंकलाब जिंदाबाद!PRIYANKAR wrote 5 months ago: प्रियंकर की एक कविता कृतज्ञ हूं मैं कृतज्ञ हूं मैं जैसे आसमान की कृतज्ञ है पृथ्वी जैसे पृथ्वी का क … more →
inqalabjindabad wrote 1 year ago: एक चिंगारी जल रही है भीतर उसकी लौ कभी तेज होती है कभी सोच-विचार के फेर में पड़कर धीमी पड़ जाती है ले … more →
inqalabjindabad wrote 1 year ago: जहां तो कहता है कि सूर्य की लालिमा का सौंदर्य अनुपम है, अद्भुत है तो फिर मैं क्यूं उसके सामने होने प … more →
inqalabjindabad wrote 1 year ago: बंदरवाला हाथ नचा-नचाकर बजाए जा रहा था डमरू डिग-डिग, डम-डम उछलता-कूदता, पीछे-पीछे बच्चों का मस् … more →
inqalabjindabad wrote 1 year ago: जलना किसे कहते है? जो जलकर खाक हो चुका हो या जो जल रहा हो पल हर पल जो जल रहा हो उसके पास अगर … more →
inqalabjindabad wrote 1 year ago: क्यूं लगता है डर नाराज हो जाओगी तुम मन की बात चाहकर भी नहीं जता पाता लबों पर लफ्ज आए इससे पहले … more →
inqalabjindabad wrote 2 years ago: कई बार चाहा मैंने कि भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ कर सकूं न्याय असफल रहा मैं..! कोयल की कूक यंत्र … more →
inqalabjindabad wrote 2 years ago: आधी रात को पलकों का चमकना जांबाज धड़कनों का धड़-धड़-धड़-धड़ धड़कना हृदय में स्वप्नों की कुलबुलाहट कि … more →
inqalabjindabad wrote 2 years ago: मेरी जिंदगी में शामिल हैं कुछ नये, कुछ पुराने और कुछ अनजान-से रिश्ते! सोचता हूं क्यूं ना उन अनजाने … more →