विनय wrote 1 year ago: जो मुझको जानते हैं ज़रा कम जानते हैं जो नहीं जानते हैं ज़रा ज़्यादा जानते हैं जो ढीठ बनके बैठा हुआ है म … more →
विनय wrote 1 year ago: क्यों? बेशर्म क़तरा-क़तरा ज़हन नहीं ढलता क्यों? मुझे बेक़रारियों से क़रार नहीं मिलता क्यों? ढल रहा हूँ दि … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़लिश को जगह न दो दिल में नासूर बन जायेगी मरहम भी न लगा पाओगे साँस घुट के मर जायेगी ज़ीस्त अलग है, ज़ी … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़ुदा ने जब किसी को न कहा अपना ख़ुदा फिर तूने क्यों कहा ग़ैर को अपना ख़ुदा यह तो हद ही कर दी तूने, य … more →
विनय wrote 1 year ago: हमने आसमाँ से टूटके गिरते सितारे को ज़मीं पे आते देखा है आसमाँ पे था तो चमकता था ज़मीं पे है तो दहकता … more →
विनय wrote 1 year ago: ज़िन्दगी… एक हीरे की अंगूठी है न उंगली में पहन सकूँ न ज़ुबाँ से चाट सकूँ मौत और मेरे दर्मियान बस … more →
विनय wrote 1 year ago: रक़ाबी चाँद जला दो यह रात चाँदनी हो जाये कभी तो पास बुला लो तेरी नज़दीकियों का मुझे एहसास हो जाये गुला … more →
विनय wrote 1 year ago: यह ज़िन्दगी मेरी एक पतंग है मैं जिसको चाहता हूँ वह मुझसे बेरंग है उड़ती है बिल्कुल अकेली ढ़ूढ़ती है क … more →
विनय wrote 1 year ago: जब से भूल जाना चाहा तुमको तेरी याद और भी आती है सपना क्या कभी कोई ऐसा हुआ जो बिखरा नहीं बची राख को आ … more →
विनय wrote 1 year ago: किस राह को चल रहे थे किस राह को हम चल दिये, उनसे प्यार लिए हम चले इक नये सफ़र पर, लुटा दिया सारा जो क … more →
विनय wrote 1 year ago: इक तरफ़ वह इक तरफ़ हम बीच में यह फ़ासले इश्क़ की डोर से हमने जो बाँधे बन्धन क्या ख़बर उन पर गींठ लगी भी … more →
विनय wrote 1 year ago: वह कहाँ चले गये जो कल घर आये थे हमारे थोड़ा-सा और क़रीब हमारे वह कहाँ चले गये जो कल घर आये थे हमारे ब … more →
विनय wrote 1 year ago: तेरी यादों के साये तले जाने हम- कितनी दूर तक चले क्या ख़बर कब… थकते क़दमों की शाम ढले जाने कब प … more →
विनय wrote 1 year ago: बहारों का मौसम शाख़ों पर खिलने लगा है मज़िलों की बेताबी का चाँद अब दिखने लगा है सफ़र बहुत तवील है और ल … more →
विनय wrote 1 year ago: जब-जब चाँद को छूना चाहा है मैंने बादलों के साये उसको दूर ले गये मैं अब कि ऐसा मौसम बनाऊँगा बादलों के … more →
विनय wrote 1 year ago: यह रंगीन फ़िज़ा बेरंग दिख रही है सावन की बदली तंग दिख रही है एक मैं सिर्फ़ मैं यहाँ बैठा रहता हूँ बैठकर … more →
विनय wrote 1 year ago: मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं अगर मैं झूठा हूँ तुम जो गये हो यहाँ से पल-पल मैं टूटा हूँ किसी का एतबार नह … more →
विनय wrote 1 year ago: क़िस्मत की लकीरें मुझे तुझसे दूर रखती हैं यह नम आँखें तेरी याद में चाँद तकती हैं आँखें जब बंद करता हू … more →
विनय wrote 1 year ago: किसी आस्माँ के परे तो तेरी मुहब्बत का हासिल मिलेगा कितनी तन्हाइयाँ तय करें कब हमें इनका हासिल मिलेगा … more →