(जब ग़ालिब पूछते हैं) कोई उममीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअइयत है नींद कयूं रात भर नहीं आती आगे आती थी हाले दिल पे हंसी अब किसी बात पर नहीं आती है कुछ ऐसी बात जो चुप हूं वरन… more →
dipankargiri wrote 1 year ago: (जब ग़ालिब पूछते हैं) कोई उममीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती मौत का एक दिन मुअइयत है नींद कयूं … more →
Tags: न रदीफ न काफिया न पाब
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