ज़मीं पे पैर रखो आसमान हो जाओ जिसे दोहराये जहां दास्तान हो जाओ बेखबरी के आलम से मुल्क लरज़ाया सा है टिके जिस पे वो संगेआस्तान हो जाओ अगर निगाह में बस खार नज़र आते हैं खिलाओ गुल और गुलसितान हो जाओ मिली वि… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: ज़मीं पे पैर रखो आसमान हो जाओ जिसे दोहराये जहां दास्तान हो जाओ बेखबरी के आलम से मुल्क लरज़ाया सा है टि … more →