( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से ) छुटा देश तो जीना दूभर दुखड़ा किससे कहना माया मोह की गठरी लादे सुख दुख इसके सहना समझे दर्द न दिल का कोई घूटी रही अभिलाषा मातृस्न… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: ( एक प्रवासी भारतीय के द्रष्टिकोण से ) छुटा देश तो जीना दूभर दुखड़ा किससे कह … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पिचकारी खेले ससुरी ऐसे रंग फेंक कर के मचलती कैसे बौछार तीर की निकलती ज्वाला चमकार बिजली की झूमती … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: सार्थक है वह कविता - जो मंत्रियों की चाटुकारिता से परहेज न करे जो राजों रजवाड़ों के भाट चारण का वारि … more →