वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दु… more →
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!Krishna Kumar Mishra wrote 4 days ago: मेरी मां अभी शाम के वक्त मेरी मां ने मुझसे कहां कि आज उन्हे बहुत पुरानी कविता याद आ गयी, जब छत पर गय … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 1 year ago: देश में जिधर भी जाता हूँ, उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ “जडता को तोडने के लिए भूकम्प लाओ। घुप्प अ … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 1 year ago: जला अस्थियां बारी-बारी चिटकाई जिनमें चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल। कलम, आज … more →
Satish Chandra satyarthi wrote 1 year ago: सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं सच् है , विपत्ति जब आती है , कायर को … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौ … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है देख जहाँ … more →
Rewa Smriti wrote 1 year ago: पुरुष वीर बलवान, देश की शान, हमारे नौजवान घायल होकर आये हैं। कहते हैं, ये पुष्प, दीप, अक्षत क्यों ला … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: सच् है ,विपत्ति जब आती है , कायर को ही दहलाती है , सूरमा नहीं विचलित होते , क्षण एक नहीं धीरज खोते , … more →
संपादक- मिथिलेश वामनकर wrote 2 years ago: रामधारी सिंह “दिनकर” प्रथम सर्ग वह कौन रोता है वहाँ-इतिहास के अध्याय पर, जिसमें लिखा है, … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ कब हारा ? क्षमाशील … more →
Rewa Smriti wrote 2 years ago: रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा जीव है! उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता, और फिर … more →