कुछ रिश्ते होते हैं बच्चों की होम-वर्क डायरी की तरह हमने ग़म को पहना है दिल पर किसी ज़ेवर की तरह शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००३ … more →
तख़लीक़-ए-नज़रSatish Chandra satyarthi wrote 3 months ago: सुदामा प्रसाद पाण्डेय “धूमिल” की एक और कविता आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। पता नहीं क्य … more →
विनय wrote 9 months ago: कुछ रिश्ते होते हैं बच्चों की होम-वर्क डायरी की तरह हमने ग़म को पहना है दिल पर किसी ज़ेवर की तरह शायि … more →
abhijitc wrote 10 months ago: आज अगर तुम घर पर होती, तो घर को सर पर चढ़ा ली होती, भाई कि टांग खींच रही होती, काश के तुम आज घर पर हो … more →
kmuskan wrote 1 year ago: तु कया लूटेगा उन लूटे हूओ को जो पहले ही वकत के हाथो लूटे है । तोड़ सकी जिस ना मुश्किलें हजार आज वो अप … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: खुशबू जैसे सब रिश्ते हैं, जितना थामूं उड़ जाते हैं इन रस्तों में कुछ गड़बड़ है, उसकी जानिब मुड़ जाते हैं … more →
विनय wrote 1 year ago: मीठी-मीठी बातें वह शबनमी रातें सब याद हैं हमें वह रस्ते वह रिश्ते जो हमने क़ायम किये थे वादे जो हमने … more →
abhijitc wrote 2 years ago: जाने कब से तड़प रहा था । एक प्यारी-सी बहना के लिए ॥ बचपन से मुझे थी यह आस । की होगी एक लाडली बहना, म … more →