कुछ रिश्ते होते हैं बच्चों की होम-वर्क डायरी की तरह हमने ग़म को पहना है दिल पर किसी ज़ेवर की तरह शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००३… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: कुछ रिश्ते होते हैं बच्चों की होम-वर्क डायरी की तरह हमने ग़म को पहना है दिल पर किसी ज़ेवर की तरह शायि … more →
विनय wrote 1 year ago: उस्लूब*, उस्लूब, उस्लूब क्या पढ़ने वाले इनको समझते हैं वज़नी हो सीने पर गर ज़ख़्म उसे पढ़ने वाले दर्द … more →
विनय wrote 1 year ago: बहुत पुराना है वह रिश्ता जिसे गठरी में बाँधकर रखा है मेहमान को बिठाया बाहर घर को किराये पर दे रखा है … more →
विनय wrote 1 year ago: हम सब के सच्चे दोस्त हैं हर दिल की बात समझते हैं उसकी ख़ुशी को हम अपने ख़ुशी के आँसुओं में रखते हैं … more →
विनय wrote 1 year ago: धीरे-धीरे ग़म सहना, किसी से कुछ न कहना फ़ितरत ऐसी हो गयी, दिन-रात मरके जीना शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़ … more →
विनय wrote 1 year ago: आज फिर मुझको खिड़की से दिख रहा है चाँद आधा-आधा जिस तरह से मैं जी रहा हूँ वो भी कहीं जी रहा है आधा-आध … more →
विनय wrote 1 year ago: यह सावन मेरा मन पढ़-पढ़ रोया अबकि बार यह गरज मुझे डराती रही तेरे तेवर की तरह बदलना था तुम्हें तो मुझ … more →
विनय wrote 1 year ago: मतलब से ही जनम लेता है कोई रिश्ता मतलब से ही मिट जाता है वह रिश्ता तख़लीक़ के इस भँवर में तकलीफ़ है बह … more →