दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आखिर ब्लैकआउट के वक्त उनके ही घर से रौशनी के आग़ाज़ का जोखिम वे कैसे उठा सकते थे आफ़ताब के सपने संजोती उ… more →
सृजन और सरोकाररवि कुमार, रावतभाटा wrote 1 month ago: रौशनी का महाविस्फोट – महेन्द्र नेह ( a kavita poster by ravi kumar, rawatbhata) शब्दों के कुछ … more →
Nidhi KM wrote 3 months ago: चलते थे जिस ज़मीं पर, संभल संभल कर हम, सरकी वही ज़मी नये कदम उठाने के पहले, आसमान से तो पानी बरसता … more →
दीपक भारतदीप wrote 7 months ago: संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि ———————— तारा मण् … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने शहर पर इतना नहीं इतराओ कि फिर पराये लगने लगें लोग सभी कभी यह गांव जितना छोटा था तब न तुम थे यहा … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 years ago: भ्रम की रात काली है, एक अंधेरी जाली है। जब भी घूम कर देखा दिखायी दी हर ओर काली रेखा पर कालिमा के बीच … more →
रवि कुमार, रावतभाटा wrote 1 month ago: दीपावली फिर टल गई (a poem by ravi kumar, rawatbhata) आफ़ताब का दम भरने वाले दिए की लौ से खौफ़ खा गए आ … more →