इक जाम-ए-जुनूं को लबों से लगाया है दिल को इक नये ग़म का नशा कराया है ये कैसी हलचल मची है महफ़िल में क्या कोई चाक जिगर महफ़िल में आया है रो रही है रात चांद से छुपकर देखो साज़-ए-दिल किस ख़ाकजां ने बजाया है म… more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: इक जाम-ए-जुनूं को लबों से लगाया है दिल को इक नये ग़म का नशा कराया है ये कैसी हलचल मची है महफ़िल में क् … more →