आज कई दिन बाद लिख रही हूँ क्योंकि काम बहुत था, घर में नहीं कार्यस्थल पर। थोड़ी साँस ली तो सोचा कुछ लिख डालूँ। लिखना हमारी भूख है। हमारी संतुष्टि है, हमारी ज़रुरत है, हमारा काम है। हम लिखते हैं अपने लिए … more →
पसंदप्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: आज कई दिन बाद लिख रही हूँ क्योंकि काम बहुत था, घर में नहीं कार्यस्थल पर। थोड़ी साँस ली तो सोचा कुछ लि … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: जब स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव हुए थे तो माँ-पिताजी बताते थे कि इतना उत्साह था मन में कि पता नहीं क … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: आजकल जब भी बाज़ार जाते हैं और कुछ ऐसा सामान खरीदते हैं जैसे- सब्जी, फल या अन्य वह सब चीज़ें जो छोटी थ … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: जीवन में ठेकेदारी का बड़ा महात्म्य बताया गया है। हर काम ठेके पर देने से मालिक एक दम निरचु हो जात है, … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: - प्रधानजी/प्रधानाजी गुस्से में गाली दें तो ठीक है क्यों कि उनको प्रधानत्त्व के साथ-साथ विशेषाधिकार … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: महिलाओं की सभी समस्याएँ एक दूसरे से जुड़ी हैं। उनकी जड़े एक ही जगह हैं। समाज और परिवार जब तक अपनी सोच … more →
प्रेमलता पांडे wrote 3 months ago: रहिमन देख बड़ौन को लघु न दीजिए डार, जहाँ काम आवै सुई कहा करे तलवार।’ बचपन में पढ़ी यह कहावत कभी भूली … more →
प्रेमलता पांडे wrote 4 months ago: हमने होली पर कई जगह पहले भी लिखा है। यहाँ और वहाँ। पर आज मन उड़ चला उस चौराहे पर जहाँ आजकल शाम को सा … more →
प्रेमलता पांडे wrote 4 months ago: वह अपने पिता से पिट गया। सारे में हल्ला हो गया। जिसे न पता हो उसे भी पता चल गया। हाय री दुनिया! बच्च … more →
प्रेमलता पांडे wrote 4 months ago: शिव कर्ता, धर्ता, हर्ता, कहे गए हैं। उनसा दानी, उनसा ग़ुस्सैल कोई नहीं। औघड़, मलंग न जाने उनके कितने … more →
प्रेमलता पांडे wrote 4 months ago: ’प्यार की बात न हो तो अच्छा है, बिन बात ही प्यार होतो सच्चा है। प्यार की बात का तो अर्थ होता है, प् … more →
प्रेमलता पांडे wrote 6 months ago: थोड़ी सी खाँसी उठी और हृदय-गति रुक गयी। संसार में शरीर पड़ा रहा, आत्मा निकल गयी। यही जीवन है। एक कम सा … more →
प्रेमलता पांडे wrote 7 months ago: गंगोत्री ग्लेशियर से निकली तीनों धाराएँ अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी हिमालय की गोद छोड़कर नीचे धाती ह … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: ज़िंदगी जीने का अंदाज़ सबका अलग-अलग होता है। सबके सुखों की परिभाषा भी अलग होती हैं। सैंतीस साल से अध्य … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: ले रंग पर कोई और रंग नहीं चढ़ पाता है। रंगरेज लाख कोशिश करे पर काला तो अमिट होता है। इसके पक्केपन के … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: हम शाम लगभग पाँच बजे जानकीचट्टी पहुँच गए। अति शीतल हवा और बर्फ के नन्हे कणों के समान फुहारों ने हमें … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: हमारी दादी जिनको (बहत्तर साल की आयु में) दिवगंत हुए भी पैंतालीस साल से ऊपर हो गए हैं, यह कहानी सुनाय … more →
प्रेमलता पांडे wrote 8 months ago: आज अन्नकूट और गोवर्धन पूजा का उत्सव है और विश्वकर्मा-दिवस भी है। सभी के पीछे बहुत गहरी आस्था और विश् … more →
प्रेमलता पांडे wrote 9 months ago: घर से दो दिन के लिए ही क्यों न जाओ डर ही रहता है कब कौन कब्ज़ा करले! समय ही ऐसा है। सब को अपनी-अपनी प … more →