पिछली शताब्दि के अंतिम दशक के आरंभ के आसपास अपने यूरोपीय अनुभव से प्रेरित होकर मैंने निर्णय लिया कि मैं जहां-जहां संभव हो सके वहां-वहां हिन्दी का प्रयोग करूं । किसी परिचित, मित्र, सहकर्मी अथवा अधिकारी… more →
हिन्दी तथा कुछ और भीshreesh k. pathak wrote 1 month ago: विस्तृत प्रांगण तिरछी लम्बी पगडंडी अभी बस हलकी चहल-पहल , विश्वविद्यालय में, दूर; उस सिरे से आती तुम … more →
योगेन्द्र जोशी wrote 10 months ago: अपने देशवासियों की एक विचित्र आदत मुझे सदैव से ही विचलित करती रही है । यह आदत है अपने अनुचित कार्यों … more →
योगेन्द्र जोशी wrote 1 year ago: पिछली शताब्दि के अंतिम दशक के आरंभ के आसपास अपने यूरोपीय अनुभव से प्रेरित होकर मैंने निर्णय लिया कि … more →
योगेन्द्र जोशी wrote 1 year ago: (पिछले चिट्ठे से आगे) अध्यापन के अपने जीवन में मेरा सर्वाधिक दिलचस्प अनुभव यह रहा कि विश्वविद्यालय स … more →