वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर ये क्या … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम ह … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: जब से मैने वो हँसी सा पैकर देखा है झूमता गाता हुआ हर मंज़र देख है राह में मिलनेवालों से लेते हैं अपनी … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: सच शय है वो जिसको कभी बोला नहीं जाता अपनी ही क़ब्र को कभी खोला नहीं जाता क्या रंग सियासत ने दिया है ज … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: वो नहीं क़ातिल ये तो खंजर की ख़ता थी वो कहाँ बदले मेरी नज़र की ख़ता थी उस ही की दीवारें ज़रा मजबूत नहीं थ … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: हर तराशा हुआ बुत ख़ुदा नहीं होता हर आँख में दिल का आईना नहीं होता रही होंगी शायद कोई मजबूरियां उसकी व … more →