नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा न तर्ज़े-जाम४ इस मैकदे के बीच अबस५ आफ़रीदा६ हूँ तू आपसे७ ज़बाँज़दे-आलम८ है वरना मैं इक हर्फ़े-आरज़ू… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 4 months ago: नै१ बुलबुले-चमन न गुले-नौदमीदा२ हूँ मैं मौसमे-बहार में शाख़े-बरीदा३ हूँ गिरियाँ न शक्ले-शीशा व ख़ंदा … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़ुशबू बिछायी है राहों में तुम चले आओ, तुम चले आओ दिल बेक़रार है बहुत तुम चले आओ, तुम चले आओ मौसम बड़ … more →
विनय wrote 1 year ago: ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी सूखे पत्ते उड़ाने लगी दरख़्त की शाख़ों पर धूप की बूँदें नहीं सूरज का दरिया है … more →
विनय wrote 1 year ago: कोंपलें हर शाख़ बनी पत्तियाँ अब दामने-ग़म में लौट गयी ख़िज़ाँ अब देखो उस रात पर शिगाफ़ आने लग गये असरका … more →
विनय wrote 2 years ago: मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा मुझे उम्मीद रही वो मुझको सोने की तरह छूकर देखेगा… उसने कुछ … more →