दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: चिल्ला-चिल्लाकर करते हैं प्रेम मजे के लिए चाहिए जैसे गेम आखों में बसाए रहते हैं पाश्चात्य सभ्यता वाल … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जगह-जगह नारे लगेंगे आज प्यार के नारे बाहर ढूंढेंगे प्यार घर के दुलारे प्यार का दिवस वही मनाते जो प्य … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: सब समान जुटाकर निकले सफर पर ख़त्म हो गया तो लौटे अपने ही घर रास्ते बदलते गए, हम चलते गए कुछ देखा … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: बौद्धिक अँधेरे में ज्ञान के चिराग कुछ यूँ बेचे जा रहे हैं सदियों से अपनी जगह खडे बुत भी लोगों को चल … more →
दीपक भारतदीप wrote 2 years ago: न पीडा से न किसी चाहत से न किसी शब्द से वह बहता आता है सहज भाव से अपनी पीडाओं को भुला दो अपनी चाहतों … more →