आंधी चलकर फिर रुक जाती है धरती हिलती नहीं भले कांपती नजर आती है। मौसम रोज बदलते हैं उससे तेज भागते हैं, आदमी के इरादे पर सांसें उसकी भी कभी न कभी उखड़ जाती हैं फिर भी जिंदगी वहीं खड़ी रहती है भले अपना घ… more →
दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिकादीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक बच्चे के पैदा होने पर घर में खुशी का माहौल छा जाता है भागते हैं घर के सदस्य इधर-उधर जैसी कोई आसमा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मंडप में पहुंचने से पहले ही दूल्हे ने दहेज़ में मोटर साइकल देने की माँग उठाई उसके पिता ने दुल्हन के … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: घर भरा है समंदर की तरह दुनियां भर की चीजों से नहीं है घर मे पांव रखने की जगह फिर भी इंसान बेचैन है च … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपने मन में है बस व्यापार बाहर ढूंढते हैं प्यार मन में ख्वाहिश सोने, चांदी और धन के हों भण्डार पर दू … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: एक सपना लेकर सभी लोग आते हैं सामने दूर कहीं दिखाते हैं सोने-चांदी से बना सिंहासन कहते हैं ‘तुम उस पर … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आज मजदूर दिवस है आओ सब मिलकर नारे लगायें जो गरीबों और मजदूरों को भायें जन कल्याण और न्याय के लिये जो … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मेरी नाव डुबोने वाले बहुत हैं पर उनकी याद कभी नहीं आती मझधार में भंवर के बीच आकर जो किनारे तक पहुंचा … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अब तो मुद्दे जमीन पर नहीं बनते हवा में लहराये जाते राई से विषय पहाड़ बताये जाते मसले अंदर कमरे में क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: कहते हैं पत्थर के बुतों में भगवान नहीं मानेंगे पर भगवान के बुत उड़ाने पहुंच जाते जवाब नहीं देना इसलि … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: जिनको देखने के लिय मचलता है मन अगर वह पास आते हैं तो हो जाता है अमन बातें होतीं हैं प्यारी कभी होती … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: अपनी अलग पहचान के लिये भीड़ से अलग होना ही पड़ता है जब चुनते हैं अपनी अलग राह छोड़नी पड़ती है साथी क … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: आया फंदेबाज और बोला ‘दीपक बापू मैं हीरो का ब्लाग पढ़कर आया हिंदी तो ढंग से पढ़ना नहीं आती पर उसका अं … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: सारा दिन कान से मोबाइल चिपका कर प्रेम की बातें करने वाले प्रेमी के कान हो गये खराब कभी आवाज आती तो … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: बदलते मौसम के साथ मन भी यूं बदल जाता है जैसे उसके साथ बंधे हों हाथ ग्रीष्म के जलती दोपहर में व्यग्रत … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: सादगी से कही बात किसी को समझ में नहीं आती है इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की चाशनी में डुबो कर सुन … more →
दीपक भारतदीप wrote 8 months ago: सादगी से कही बात किसी को समझ में नहीं आती है इसलिए शायद कुछ लोग श्रृंगार रस की चाशनी में डुबो कर सुन … more →
दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: परदेस में पुजने से ही देश में भगवान बनेंगे कैसा यह उनका भ्रम है। देश के लोगों से मिले मान से क्या गौ … more →
दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: निकले थे अंधेरे में माटी के चिराग ढूंढने पर कांच के बल्ब के टुकड़े लग गये पांव में रौशनी ने भी अपने … more →
दीपक भारतदीप wrote 11 months ago: अपनी काबलियत पर न इतना इतराओ इनाम यहां यूं ही नहीं मिल जाते हैं भीख मांगने का भी होता है तरीका लूटने … more →