गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है गुलाबी अंगों में निखार किसके लिए है क्या सजन जी से मिलने का कोई वादा है कहो ना हमसे आज क्या इरादा है…! लटों की’ यह शरारत किसके लिए है दिन-रात इतनी चाहत किसक… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविजय सारस्वत wrote 3 months ago: कविता-बसंत रै संग आयो फागण बसंत रै संग आयो फागण प्रेम री राग रंगीली बसंत रै संग, खुशी बांटण चाल्यो आ … more →
विनय wrote 7 months ago: गोरी, आज यह सिंगार किसके लिए है गुलाबी अंगों में निखार किसके लिए है क्या सजन जी से मिलने का कोई वादा … more →
विनय wrote 1 year ago: जब कभी वह शाम मुझे याद आयी मेरी जाने-बहाराँ तू बहुत याद आयी माना आज शाम का वह रंग नहीं और मेरी जान त … more →
विनय wrote 1 year ago: यह ज़िन्दगी मेरी एक पतंग है मैं जिसको चाहता हूँ वह मुझसे बेरंग है उड़ती है बिल्कुल अकेली ढ़ूढ़ती है क … more →
विनय wrote 1 year ago: जब साँसों में समायी नयी सुगन्ध जब मिले पत्तों को लाल-हरे रंग जब आया जीवन में मेरे बसंत जब तन-मन में … more →
विनय wrote 1 year ago: तू कर यह वादा भी मेरे अल्लाह तू संग न होगा तू है भी अगर किसी बुते-संग में तू संग न होगा तेरी मर्ज़ी स … more →
विनय wrote 1 year ago: इम्तिहाँ मेरी मोहब्बत को मुदाम देने हैं दीजिए अगर आपको इल्ज़ाम देने हैं और कौन दूसरा सितम-परस्त होगा … more →