Blogs about: संस्कृति

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न तो इतिहासग्रस्त, न ही इतिहास विमुख!2 comments

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 3 weeks ago: एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत … more →

Tags: नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, मार्क्सवाद, विरासत, Marxism, समाज और संस्कृति, कला, साहित्य, लोकवाद

धार्मिक कट्टरपन्थ फ़ासीवाद के विरुद्ध सांस्कृतिक मोर्चे पर सही क्रान्तिकारी रणनीति अपनाओ!4 comments

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 4 weeks ago: एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत … more →

Tags: भगत सिंह, सर्वहारा, साम्प्रदायिकता, फासिज्म, हिन्दी नाटक, समाज और संस्कृति, कला, साहित्य, वामपन्थी

कला-साहित्य-संस्कृति में "लोकवाद" और "स्वदेशीवाद" का विरोध करो!1 comment

Shaheed Bhagat Singh Vichar Manch, Santnagar wrote 1 month ago: एक नए सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन के वैचारिक सांस्कृतिक कार्यभार (सांस्कृतिक मोर्चे पर नई शुरुआत … more →

Tags: कविता, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, पूंजीवादी संकट, मार्क्सवाद, विरासत, सर्वहारा, साम्राज्यवाद, एन.जी.ओ

दलित-प्रश्न और स्त्री-प्रश्न पर सही रुख अपनाओ!

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Tags: समाजवाद, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, मार्क्सवाद, संघर्ष, Marxism, कविता, उदारीकरण, जीवन

कला-साहित्य के क्षेत्र में सामाजिक जनवादी प्रवृत्तियों का विरोध करो! 1 comment

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Tags: समाजवाद, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, हिन्दी नाटक, विरासत, कविता, संशोधनवाद, समाज और संस्कृति, साहित्य

सांस्कृतिक मोर्चे पर व्यक्तिवाद, अराजकतावाद, उदारतावाद का विरोध करो!

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Tags: लेनिन, सर्वहारा, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, मार्क्सवाद, विरासत, Marxism, उदारीकरण, माओ त्से तुंग

वामपन्थी" कलावाद-रूपवाद और मध्यवर्गीय लम्पटता का विरोध करो!

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Tags: नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, संघर्ष, कविता, इन्कलाब, crisis of capitalism, समाज और संस्कृति, कला, साहित्य

कला-साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर विचारधारात्मक संघर्ष

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Tags: नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, फासिज्म, मार्क्सवाद, विरासत, समाजवाद, सर्वहारा, साम्राज्यवाद, Maoism

नए सांस्कृतिक कार्यभारों की ज़मीन--- महत्तव्पूर्ण सामजिक-आर्थिक सरंचनागत परिवर्तनों और विश्व-ऐतिहासिक विपर्यय का यह दौर

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Tags: लेनिन, क्रांति, आंदोलन, कम्युनिस्ट, समाजवाद, सर्वहारा, नव सर्वहारा पुनर्जा, नव सर्वहारा प्रबोधन, पूंजीवादी संकट

भारत के शिक्षित लोगों का बौद्धिक अंतर्द्वंद्व -आलेख

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: भारत का शिक्षित वर्ग हमेशा ही मानसिक द्वंद्व में फंसा दिखता है जो पश्चात्य सभ्यता के समर्थन और विरो … more →

Tags: आलेख, कथा साहित्य, दीपक भारतदीप, व्यंग्य, शब्द, हिंदी, हिंदी कविता, हिंदी पत्रिका, हिंदी साहित्य

पैसे के साथ इश्क में भी आ सकता है मंदी का दौर - हास्य व्यंग्य

दीपक भारतदीप wrote 1 month ago: क्वीसलैंड यूनिवर्सटी आफ टैक्लनालाजी के प्रोफेसर कि अनुसार इस मंदी के दौर में लोगों के दाम्पत्य जीवन … more →

Tags: अनुभूति, अभिव्यक्ति, आलेख, मस्तराम, व्यंग्य, हास्य व्यंग्य, हिन्दी पत्रिका, Blogging, Dashboard

हिन्दी के वर्जित प्रदेश में...

Aditya Nigam wrote 8 months ago: [यह लेख कुछ अरसा पहले वाक् पत्रिका के लिए लिखा गया था - पुराने दोस्त सुधीश पचौरी के इसरार पर। जब यह … more →

Tags: Debates, bad ideas, Culture, Politics, हिन्दी, हिन्दुस्तानी, समाज विज्ञान, अनुवाद

रहीम संदेशः समय के अनुसार फल मिलता है और झड़ जाता है

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात सदा रहै नहीं एक सौ, का रहीम पछितात? कविवर रहीम कहते हैं कि समय चक … more →

Tags: Hindi writing, web duniya, hindi megzine, web dunia, web bhasakar, web nai duniya, Deepak bharatdeep, हिंदी पत्रिका, समाज

‘बिन फेरे हम तेरे’ से चिंतित घनेरे-हास्य व्यंग्य live in reletionship

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: ‘बिन फेरे, बने बसेरे’ को जब राज्य की वैधानिकता का प्रमाण मिलना प्रस्तावित भर हुआ है तब देश में एक न … more →

Tags: समाज, हिंदी, Friends, hasya vyang, hasya -vyangya, hindi article, Hindi writing, writer, Add new tag

चाणक्य नीतिः दिल के पास और परे होने का संबंध जज्बात से2 comments

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: 1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि … more →

Tags: Hindi writing, web duniya, hindi megzine, web dunia, web jagaran, web bhasakar, web nai duniya, Deepak bharatdeep, हिंदी पत्रिका

रहीम संदेशः मतलब के हिसाब से बदलती है लोगों की नजरें1 comment

दीपक भारतदीप wrote 9 months ago: स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि कविवर रहीम कहते हैं कि लोग … more →

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विदुर नीतिःक्षमाशील क्रोध रोककर अभद्रता करने वाले को नष्ट कर डालता है

दीपक भारतदीप wrote 10 months ago: 1.दूसरों के अभद्र शब्द सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतम … more →

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जयंती कुमारेश : सुप्रसिद्ध वीणा वादिका 1 comment

अंकुर वर्मा wrote 1 year ago: इस बार नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कर्णाटक शैली की सुप्रसिद्ध वीणा वादिका श्रीमति जयंती कुमारेश को सु … more →

Tags: कला और संगीत

रोशनी के घेरे3 comments

स्वाधीन wrote 2 years ago: कभी बचपन में स्कूल में श्रीमती सरोजिनी नायडू की एक कविता पढ़ी थी- ‘द बैंगिल सैलर्ज़‘. यह ग … more →


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