सदियाँ कटता रहूँगा वक़्त गुज़ारता रहूँगा तुम जो हँसते रहो मैं भी हँसता रहूँगा.. शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’ लेखन वर्ष: २००२… more →
तख़लीक़-ए-नज़रविनय wrote 1 year ago: सदियाँ कटता रहूँगा वक़्त गुज़ारता रहूँगा तुम जो हँसते रहो मैं भी हँसता रहूँगा.. शायिर: विनय प्रजापति ‘ … more →
विनय wrote 1 year ago: आती-जाती रहती हैं यह सदियाँ रास्ते पर रहती हैं मेरी दो अँखियाँ तेरे इंतज़ार में तुझे देखने के लिए जान … more →
विनय wrote 2 years ago: सौंधी हुई एक खु़शबू मेरी आँखों में आकर सो गयी है कभी भर जो आती है आँख सारा मंज़र महका देती है… … more →