सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा रहने दे आँखों को भरा-भरा सपने सारे मेरे टूटे जो साथी तुम मुझसे रूठे मरना गर मेरा वफ़ा हो तो मेरी जान क्यों ख़फ़ा हो आना त… more →
तख़लीक़-ए-नज़रNidhi KM wrote 1 week ago: एक कमरा सपनो भरा, फर्श मखमली, छत सितारों भरीं, दीवारें रंगों सजीं, खिड़कियाँ फूलों रंगीं, सपने कहीं … more →
Gayatri wrote 2 months ago: कुछ तो हो जो ख़ास हो मुझमे भी कोई बात हो दिलो को जो लुभा सके ऐसा कोई अंदाज़ हो यही चाहता है हर कोई की … more →
Nidhi KM wrote 4 months ago: छोटे छोटे सपने थे, पास मेरे सब अपने थे, न थी चाह, आसमान मे उड़ाने की, धरती ही मेरी अपनी थी, बड़ा सोच … more →
Nidhi KM wrote 5 months ago: कुतर दिए है, पंख अपने, जिनसे उँची उड़ान भारी थी, नील गगन मे, स्वच्छन्द उड़ चली थी, तोड़ दिए है, सब स … more →
prithvi wrote 5 months ago: उस संदूक को कई दिनों से खोला नहीं था. आज सुबह सुबह पता नहीं क्यूं अचानक कैसे उसके पास पहुंच और कपड़ … more →
ambuj wrote 11 months ago: फूलों का होगा एक बाग़, ऐसा सोचा था हमने, कुछ क्यारियां, कुछ पौधे, और पौधों पे होंगी कुछ कलियाँ ऐसा स … more →
ambuj wrote 11 months ago: फूलों का होगा एक बाग़, ऐसा सोचा था हमने, कुछ क्यारियां, कुछ पौधे, और पौधों पे होंगी कुछ कलियाँ ऐसा स … more →
देवब्रत सिंह wrote 11 months ago: आजकल संसार की जो स्थिति है, मैं उससे बहुत दु:खी हूँ।मेरी आँखों में आंसू आ जाते हैं जब मैं अपने बचपन … more →
kmuskan wrote 1 year ago: सरकार सोती रही मीठे सपने में खोई रही आंतकी धमाके करते रहे पर वो स्वप्न निद्रा से न जागी खुफिया एजेंस … more →
विनय wrote 1 year ago: सहने दे ग़म थोड़ा – थोड़ा जो तुमने रुख़ मोड़ा-मोड़ा जान यह जाने दे ज़रा-ज़रा रहने दे आँखों को भर … more →
विनय wrote 1 year ago: तन्हाई में भी हम दोनों साथ हैं यूँ लगता है मानो हाथों में हाथ हैं वह पहली शाम जब देखा था तुम्हें मैं … more →
pryas wrote 1 year ago: तुम भूल जाओ या याद रखो, कोई आयेगा इसकी आस रखो. धूप में पिघल जायेंगे सपने, जुल्फों की छाँव पास रखो. ह … more →
विनय wrote 1 year ago: तू जाके फिर ना आयी मगर बार-बार आती रही तेरी याद सबने सुनी कहानी मेरी पर ना सुनी गयी मेरी फ़रियाद मैं … more →
Amarjeet Singh wrote 1 year ago: एक पल सुखी एक पल दुखी, दो घड़ी कुछ इस तरह बीत चली, ज़िंदगी जैसे मुझसे रूठ चली, एक पल अपना एक पल पराया … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मेरी आदत है कि आते ही अपने ईमेल पर चिट्ठाकारों की चर्चा को अवश्य पढ़ता हूं। उसमें हमेशा अपने मतलब की … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: ब्लागस्पाट के ब्लाग एक आकर्षक कूड़ेदान की तरह लगते है। उस दिन मैं अपने टेलिफोन और इंटरनेट कनेक्शन का … more →
Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष wrote 1 year ago: सपने ये निगाहों के सच हों न हों, ज़िन्दगी मे हम करीब हों न हों । ऐ दोस्त तुझे रखेंगे सदा इस दिल में, … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: हिन्दी ब्लोगिंग में आने के कुछ समय बाद ही मुझे लगने लगा था कि ब्लोगरों पर भी व्यंग्य लिखना चाहिए पर … more →
दीपक भारतदीप wrote 1 year ago: मैं तो इस अंतर्जाल को एक तरह का इंद्रजाल भी मानने लगा हूँ। अपनी पोस्टों का पीछा मैं कभी नहीं करता और … more →