dipankargiri wrote 1 year ago: उन संबंधों के नाम जो अब नहीं सताती बिजली के खंभों की तरह खड़े थे हम दोनो दूर से एक दूसरे को देखते … more →
dipankargiri wrote 1 year ago: अनु के लिए जो आज भी मुसकुराती होगी ठीक उसी वकत देखना चाहता हूं तुमहें ठीक उसी वकत न आगे न पीछे ठीक … more →
dipankargiri wrote 1 year ago: भाई रविंदर के आज़ाद नग़मों के लिए हवा के सहारे टंगे हुए हैं हम न हमसे कोई मोहबत करता है न नफरत न कोई … more →
dipankargiri wrote 1 year ago: उस सड़क का नाम उस आदमी के उपर रखा गया था जिसने किसी अंतॆराषटीय सभा में किसी धमॆ का पाठ पढ़ाया था अब … more →
dipankargiri wrote 2 years ago: ये तपिश की रात क्यूं नहीं उठकर चली जाती कहीं कि पहाडों में खडा कोई पेड हाथ तो हिलाता होगा। कि अपनी श … more →
dipankargiri wrote 2 years ago: छिलते कटते चोट खाते हाथ पांव उंगलियां फोडते हम शहर के चौराहे पर खडे हो जाते। हर दोपहर थोडे और बडे हो … more →
dipankargiri wrote 2 years ago: तुम क्या जानो कैसे सजती है बूंदों की महफिल। तुम क्या जानो सीप से कैसे मिलती हैं बूंदे। मिटटी के रेले … more →