है बड़ा उसमें जो दम। चल पडे उसके कदम। देखो क्या करती कलम। कभी होती है नरम। कभी होती है गरम। देखो क्या करती कलम। छोड देती है शरम। खोल देती है भरम। देखो क्या करती कलम। कभी देती है ज़ख़म। कभी देती है मरहम।… more →
रज़िया "राज़""रज़िया" wrote 3 months ago: है बड़ा उसमें जो दम। चल पडे उसके कदम। देखो क्या करती कलम। कभी होती है नरम। कभी होती है गरम। देखो क्य … more →
"रज़िया" wrote 4 months ago: क्यों कैसी रही? आज? बड़ा ग़ुरूर था अपने आप पर!! आज नर्म हो गये ना? वक़्त कब और कैसे अपना रुख़ बदलेगा कि … more →
"रज़िया" wrote 4 months ago: तुम जा रही हो, अपने केरियर को एक नया रंग देने के लिये। तुम्हारी प्रगति से सब खुश हो रहे हैं … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: बूरा जब वक़्त आता है, सहारे छूट जाते हैं। जो हमदम बनते थे हरदम, वो सारे छूट जातेहै। बड़ा दावा करें हम … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: जो चला वक्त उसी वक्त को तूँ याद न कर। बीती पलकों में यूं ही जिन्दगी बरबाद न कर। भूल जा … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: मेरी ख़ामोशीओं की गुंज सदा देती है। तू सुने या ना सुने तुज़को दुआ देती है। मैंने पलकों में … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: ज़ाम जब पी ही लिया है तो सँभलना कैसा? समंदर सामने है फ़िर अपना तरसना कैसा? ख़ुलके जी लेते है वों फ़ … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: आदमी है, आदमी से मिल मिलाता तू चलाजा। गीत कोइ प्यार के बस गुनगुनाता तू चलाजा। गर तु … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: कानों में गुनगुनातीं हैं वो माँ की लोरियाँ। बचपन में ले के जाती हैं वो माँ की लोरियाँ। लग जाये … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: बचपन हॉ हॉ ये बचपन। नादान भोला ये बचपन। कहीं ऑसु से भीगा ये बचपन। कहीं पैसों में भीगा ये बचपन। धूल-म … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: दुनिया एक मुसाफिरख़ाना है,कभी आना है, कभी जाना है। कोई मिलते है,कोई बिछडते है,यही … more →
"रज़िया" wrote 1 year ago: जाने कैसा ये बंधन है? उजला तन और मैला मन है। एक हाथ से दान वो देता। दूजे से कंइ जानें लेता। रहता ब … more →