फ़िर से लग गई है दुकाने फ़िर से सज गए है बाज़ार दिल्ली फ़िर अपनी रफ़्तार से चल पड़ी है धमाके के मंजर को भूल ज़िन्दगी फ़िर पटरी पे आ गई है पर वो कैसे भूल पायेंगे …….. जिसके घर के चिराग इस नफरत की … more →
कुछ िदल सेkmuskan wrote 1 year ago: फ़िर से लग गई है दुकाने फ़िर से सज गए है बाज़ार दिल्ली फ़िर अपनी रफ़्तार से चल पड़ी है धमाके के मंजर को भू … more →
विनय wrote 1 year ago: दिल, मिलें कैसे कोई तो रास्ता दे क़ुछ यक़ीन ख़ुद पर रहे ऐसा ज़माने को वास्ता दे मैंने सपनों में सजायी ज … more →
विनय wrote 1 year ago: राहों में ढूँढ़ता हूँ कभी तुम मिलती नहीं यह भी सही जानो न जानो प्यार क्या है यह इक नशा-सा उतरता नहीं … more →
विनय wrote 1 year ago: धीरे-धीरे उतरती है साँस सीने में यह दर्द बड़ा बेदर्द है सीने में लुत्फ़ जीने क सब ख़त्म हो गया … more →
विनय wrote 1 year ago: जी मेरा सीने में कुछ सिमटता है एक नया सवाल-सा उठता है हमें ख़ुद रंज आप-से आता है क्यों सुकूँ दम-ब-दम … more →
विनय wrote 2 years ago: वह मुझे चाहती है या यूँ ही मुझसे बात करनी थी उसे कोशिश तो उसने मुझ तक पहुँचने की बहुत की थी और फिर व … more →