वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम हंसे थे इत्तेफ़ाक़न अब यूं हुआ के सावन आँखों में आ बसा है काफ़ी थे चंद लम्हे तेरे साथ के सितमगर ये क्या … more →
इक शायर अंजाना सा...Rohit Jain wrote 1 year ago: वो शख़्स धीरे धीरे साँसों में आ बसा है बन के लकीर हर इक, हाथों में आ बसा है वो मिले थे इत्तेफ़ाक़न हम ह … more →
Rohit Jain wrote 1 year ago: खुशबू कोई भटकती हुई साँसों में चली आती है काँच के ख्वाब लाती हैं, हिज्र की बिजली लाती है जब भी सुनता … more →