चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम कैसे बच पायेगा पंखी ठगी हुई सी आंखें छाया विष हलाहल नभ में उड़ती दोनो पांखें गले तीर के लग जाने के कैसे ये अरमान चीर कल… more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 1 year ago: चंचल आंखों की पीड़ा से छलक रहा क्यों जाम आंखों से आंसू बहते हैं मधुशाला के नाम कैसे बच पायेगा पंख … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: मां के हाथों की बनी जब दाल रोटी याद आई पंचतारा होटलों की शान शौकत कुछ न भाई बैरा निगोड़ा पूछ जाता … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पाषाण हो चुका यह हृदय जिससे चट्टाने आपस मे टकरा कर चूर होती बह रही नदियों मे पर अब भी कोपले खिलने क … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: खुल कर रोया था जनमने के बाद हालात अब ये है कि बरसों से चुप हूं। अंदाज़े-बयां था कातिल का जुर्म किसका … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: अमरत्व की आकांक्षा से लथपथ रावण कांचन कामिनी के पीछे भागता अहं- जो धुएं की लकीर उसे बचाने के लिये स … more →