कैसे मन की अगन बुझे राख मे शोल़े़, जलन तुझे झुलसी लपटें क्यों सह कर मौन मुखर! दिल बोले हर अंग जले वाणी सरगम की निकले सांसे चुपचुप क्यों डर कर मौन मुखर! नभमण्डल के … more →
हरिहर झाHarihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: कैसे मन की अगन बुझे राख मे शोल़े़, जलन तुझे झुलसी लपटें क्यों सह कर मौन मुखर! … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: पाषाण हो चुका यह हृदय जिससे चट्टाने आपस मे टकरा कर चूर होती बह रही नदियों मे पर अब भी कोपले खिलने क … more →
Harihar Jha हरिहर झा wrote 2 years ago: खोईखोई उलझनो का कुछ तो राज है क्या करें दिल का दर्द लाइलाज है झांझर झमझम बजी सृष्टि का मूल तारे ग्रह … more →